Saturday, February 18, 2012

महाशिवरात्रि,,,,,,,,,,,,

शिव की आराधना का पर्व ,,,,,,



महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का पर्व है। हिंदुओं के इस प्रमुख पर्व को फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है  महाशिवरात्रि व्रत की यह विशेषता है कि इस व्रत को बालक, स्त्री, पुरुष और वृ्द्ध सभी कर सकते है.


इस व्रत के दिन भगवान शिवलिंग दर्शन के लिए हजारों की संख्या में शिव भक्त आते है. सभी शिवालयों में महाशिवरात्रि के दिन बेल, धतूरा और दूध का अभिषेक किया जाता है. शिवरात्रि मात्र एक व्रत नहीं है, और न ही यह कोई त्यौहार है. सही मायनों में देखा जायें, तो यह एक महोत्सव है. इस दिन देवों के देव भगवान भोलेनाथ का विवाह हुआ था. उसकी खुशी में यह पर्व मनाया जाता है.

शास्त्रों में इस तिथि के विषय में कहा गया है, कि जिनकी जटाओं में गंगा भी शरण लेती है, तीनों लोक ( आकाश, पाताल व मृ्त्यु) के वासियों को प्रकट करने वाले है. जिनके नेत्रों से तीन अग्नि निकल कर शरीर का पोषण करति है. ऎसे श्री भगवान शिव भगवान इस तिथि में विवाह रचा कर प्रसन्न है.



व्रत के फल 

महाशिवरात्रि व्रत करने से साधक को मोक्ष प्राप्ति के योग्य बनाती है. इस व्रत को करने से व्यक्ति का कल्याण होता है. उपवासक के सभी दु:ख, पीडाओं का अंत होता है. साथ ही उसकी इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है. यह व्रत धन, सुख-सौभाग्य, समृ्द्धि की प्राप्ति होती है. इस व्रत को जो भी प्रेम भक्ति के साथ करता है, उसके सभी मनोरथ भगवान शिव की कृ्पा से पूर्ण होते है.

भगवान शिव की पूजा शुद्ध चित से करनी चाहिए. भगवान श्री देव, देवों के देव है. उनका एक नाम नीलकण्ठ है, विश्वनाथ है. भगवान भोलेनाथ का व्रत करने से व्यक्ति कि धन के प्रति क्षुधा, पिपासा, लोभ, मोह आदि से मुक्ति मिलती है. बुद्धि निर्मल होती है. और जीवन सदकार्यो की ओर प्रेरित होता है.



महाशिवरात्रि की व्रत-कथा


एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, ‘ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?’
उत्तर में शिवजी ने पार्वती को ‘शिवरात्रि’ के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- ‘एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।
शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।
अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।
पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।
एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।
कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।’
शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।’
शिकारी हँसा और बोला, ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।’
उत्तर में मृगी ने फिर कहा, ‘जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।’
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।
शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,’ हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।’
मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।’
उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।
थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।
देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।’

2 comments:

  1. जानिए की क्या होगा इस महाशिवरात्रि 17 फरवरी 2015 (मंगलवार) को विशेष----

    देवाधिदेव भगवन शिव की उपासना मनुष्य के लिए कल्पवृक्ष की प्राप्ति के समान है। भगवान शिव से जिसने जो चाहा उसे प्राप्त हुआ। महामृत्युंजय शिव की कृपा से मार्कण्डेय ऋषि ने अमरत्व प्राप्त किया और महाप्रलय को देखने का अवसर प्राप्त किया।शास्त्रों में निहित पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ही ऐसे देव हैं जो अन्य देवताओं के संकटों को भी हर लेते है। अतः उन्हें महादेव कहा जाता हैं। महादेव शिव सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सृष्टिकर्ता हैं।

    इस वर्ष शिवरात्रि का पर्व 17 फरवरी 2015 (मंगलवार) को और श्रवण नक्षत्र के योग में होगा। यह योग 20 वर्षो के बाद बन रहा है। इस कारण इस साल शिवरात्रि पर्व बेहद खास होगा।शिवअराधना के महापर्व पर इस वर्ष विशेष फल प्रदान करने वाला महामंगल योग बनेगा। महाशिवरात्रि के पहले और बाद के दिन बनने वाले योग भी भोलेनाथ के भक्तों की खातिर पूजा-अर्चना के विशेष संयोग लेकर आएंगे।

    शिवरात्रि का पर्व 17 फरवरी 2015 (मंगलवार) को मनाया जाएगा। पंडित "विशाल" दयानंद शास्त्री के अनुसार शिवरात्रि पर मंगलवार का दिन और श्रवण नक्षत्र का योग वर्ष 1995 की शिवरात्रि में पड़ा था। उनके अनुसार मंगलवार का दिन भोलेनाथ को अधिक प्रिय होता है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष शिवरात्रि की दूसरी खासियत यह है कि यह शिवरात्रि प्रदोष (त्रयोदशी) से युक्त होगी। 17 फरवरी को दोपहर 12 बजकर 35 मिनट के बाद चतुर्दशी तिथि प्रारंभ होगी। साथ ही दोपहर 12 बजकर 15 मिनट के बाद श्रवण नक्षत्र प्रारंभ होगा। यह संयोग 58 वर्षो के बाद बन रहा है। वर्ष 1957 में भी चतुर्दशी तिथि त्रयोदशी और श्रवण नक्षत्र से युक्त थी। श्रवण नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा होता है। भगवान शिव चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण करते हैं, इसलिए इस वर्ष दो-दो योग मंगल और श्रवण नक्षत्र योग और प्रदोष में श्रवण नक्षत्र का योग शिव भक्तों पर अधिक कृपा बरसाएगा।

    तीन दिनों तक पूजा का विशेष महत्व---
    पंडित "विशाल" दयानंद शास्त्री के अनुसार इस वर्ष लगातार तीन दिनों तक पितृ पूजा, कालसर्प पूजा और नागबलि-नारायण बलि कर्म एवं भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व रहेगा। 16 फरवरी को सोम प्रदोष व्रत, 17 फरवरी मंगलवार को प्रदोष युक्त शिवरात्रि और 18 फरवरी को बुधवारी अमावस्या विशेष फलदायी है। उज्जैन (मध्यप्रदेश) के गंगाघाट , रामघाट एवं सिद्धवट क्षेत्रों पर यदि इन दिनों पितृ पूजा, कालसर्प पूजा एवं नागबलि-नारायण बलि कर्म किया जाये तो अधिक फलदायी होता हैं..

    पंडित "विशाल" दयानंद शास्त्री के अनुसार महाशिवरात्रि से एक दिन पहले 16 फरवरी को भगवान शिव पर हल्दी, मेंहदी और तिलक की रस्म अदा करने वाली युवतियों के लिए विवाह की मनोकामना का फलदायी संयोग है। इस पूजा के बाद 17 फरवरी को भस्म आरती के बाद कलश अभिषेक करके विभिन्न संकटों से मुक्ति पाई जा सकती है।
    महाशिवरात्रि के दिन भोलेनाथ का अभिषेक करने के बाद उनका दूल्हे के रूप में श्रृंगार करने से भगवान शिव की अवश्य कृपा प्राप्त होती है। पंडित "विशाल" दयानंद शास्त्री के अनुसार इस बार सोम प्रदोष के बाद मंगलवार को शिवरात्रि और बुधवार को अमावस्या के साथ त्रिदिवसीय संयोग बना है। इससे अलावा मंगलवार को महाशिवरात्रि के अवसर पर अमृतसिद्धि, सर्वार्थसिद्धि एवं रवि योग के साथ रहा है। यह महामंगल योग सभी के लिए मंगलमय साबित होगा।

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  2. जानें इस शिवरात्रि पर हर मन्नत पूरी करने के लिए किस राशि के लोग क्या करें?
    किस्मत चमकाने के लिए आपको अपनी राशि अनुसार शिव पूजा करनी चाहिए? ऐसी पूजा शिवरात्रि के दिन होती है जिसमें राशि अनुसार भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है।

    पंडित "विशाल" दयानंद शास्त्री के अनुसार इस शिवरात्रि पर अगर आप अपनी राशि के अनुसार रूद्रभिषेक करें तो आपको विशेष फल प्राप्त होगा।

    मेष- इस राशि के व्यक्ति जल में गुड़ मिलाकर शिव का अभिषेक करें। या कुमकुम के जल से अभिषेक करें।वृष- इस राशि के लोगों के लिए दही से शिव का अभिषेक शुभ फल देता है।
    मिथुन- इस राशि का व्यक्ति गन्ने के रस से शिव अभिषेक करें तो जल्दी ही कर्ज से मुक्ति मिलेगी।
    कर्क- इस राशि के शिवभक्त अपनी राशि के अनुसार घी या दूध से अभिषेक करें।
    सिंह- सिंह राशि के व्यक्ति लाल चंदन के जल से शिव जी का अभिषेक करें।
    कन्या- इस राशि के व्यक्तियों को अपने अनुसार अनेक तरह की औषधियों से अभिषेक करनl चाहिए इससे आपके सभी रोग खत्म हो जाएंगे।
    तुला- इस राशि के जातक घी और इत्र या सुगंधित तेल से शिव का अभिषेक करें
    वृश्चिक- शहद से शिव जी का अभिषेक वृश्चिक राशि के जातकों के लिए शीघ्र फल देने वाला माना जाता है।
    धनु- इस राशि के जातकों को दूध में हल्दी मिलाकर शिव जी का अभिषेक करना चाहिए।
    मकर- आप अपनी राशि के अनुसार तिल्ली के तेल से शिव जी का अभिषेक करें तो आपको हर काम में सफलता मिलेगी।
    कुंभ- इस राशि के व्यक्तियों को नारियल के पानी या सरसों के तेल से शिव जी का अभिषेक करना चाहिए।
    मीन- इस राशि के जातक दूध में केशर मिलाकर शिव जी का अभिषेक करें।
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    पंडित "विशाल" दयानंद शास्त्री के अनुसार इस महाशिवरात्रि ( 17 फरवरी 2015 (मंगलवार) को) पर करें यह उपाय और पाएं लाभ ----
    ----महाशिवरात्रि के दिन गाय के कंडे को प्रज्जवलित करके घी व मिश्री के द्वारा पंचाक्षर मंत्र से हवन करके हवन की धुनी को संपूर्ण घर में घुमाने से सुख - समृद्धि शांति व सद्‌भावना में वृद्धि होती है।
    -----यदि कन्या के विवाह में अनावश्यक विलंब हो रहा हो तो कन्या के माता - पिता मंदिर में जाकर 108 बेल पत्रों से शिवलिंग की पूजा करें तथा उसके बाद 40 दिन तक घर में शिव आराधना करें, तो कन्या का विवाह जल्दी व अच्छे परिवार में होना निश्चित है।
    ------शास्त्रों के अनुसार काल - सर्प दोष निवारण हेतु महाशिवरात्रि के दिन प्रातः चांदी या तांबे से बने नाग व नागिन के जोडे को शिवलिंग पर अर्पित कर दें।
    ----महाशिवरात्रि क्रे दिन प्रातः पीपल के पेड की सरसों के तेल द्वारा प्रज्जवलित दिये से पूजा अर्चना करने से शनि दोष दूर होता है।
    ----महाशिवरात्रि के दिन उपवास रखकर चारों पहर पंचाक्षर मंत्र की एक रुद्राक्ष माला का जाप करने से दरिद्रता मिट जाती हैं।

    (अष्टदरिद्र विनाशितलिंगम्‌ तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम्‌। )

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