Monday, April 4, 2011

जय माता दी

                                                         जय माता दी 
नवरात्रि का त्योहार नौ दिनों तक चलता है। इन नौ दिनों में तीन देवियों पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों की पूजा की जाती है। पहले तीन दिन पार्वती के तीन स्वरुपों (कुमार, पार्वती और काली), अगले तीन दिन लक्ष्मी माता के स्वरुपों और आखिरी के तीन दिन सरस्वती माता के स्वरुपों की पूजा करते है
नौ  रूप 
  1. प्रथम दुर्गा : श्री शैलपुत्री
  2. द्वितीय दुर्गा : श्री ब्रह्मचारिणी
  3. तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा
  4. चतुर्थ दुर्गा : श्री कूष्मांडा
  5. पंचम दुर्गा : श्री स्कंदमाता
  6. षष्ठम दुर्गा : श्री कात्यायनी
  7. सप्तम दुर्गा : श्री कालरात्रि
  8. अष्टम दुर्गा : श्री महागौरी
  9. नवम् दुर्गा : श्री सिद्धिदात्री       
 नवरात्रि का  नौ दिनों व्रत  रखने से सुख की प्रत्ति होती है माँ दुर्गाका शब्द माँ से ही जीवन का आरंभ होता है,मां कर्म, विचार और ऊर्जा को नियंत्रित करने वाली होती है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में शक्ति उपासना का महत्व बताया गया है। हिन्दू नववर्ष की शुरूआत भी नवदुर्गा की उपासना से होती है। चैत्र माह के पहले नौ दिनों में मातृशक्ति के नौ अलग-अलग रूपों का स्मरण किया जाता है। 
१.  प्रथम दुर्गा : श्री शैलपुत्री
                                         आदिशक्ति श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनके पूजन से मूलाधर चक्र जाग्रत होता है, जिससे साधक को मूलाधार चक्र जाग्रत होने से प्राप्त होने वाली सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
२. द्वितीय दुर्गा : श्री ब्रह्मचारिणी -
                                               श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोप तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इनकी उपासना से मनुष्य के तप, त्याग, वैराग्य सदाचार, संयम की वृद्धि होती है तथा मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता।
३.तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा-
                                          इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
  ४ .चतुर्थ दुर्गा : श्री कूष्मांडा- 
                                         नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। श्री कूष्मांडा के पूजन से अनाहत चक्र जाग्रति की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है।
५. पंचम दुर्गा : श्री स्कंदमाता-                                                                                                           नवरात्रि के पंचम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा मृत्युलोक में ही साधक को परम शांति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिए मोक्ष का द्वार स्वंयमेव सुलभ हो जाता है।
६. षष्ठम दुर्गा : श्री कात्यायनी
                                              श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है। श्री कात्यायनी की उपासना से आज्ञा चक्र जाग्रति की सिद्धियां साधक को स्वयंमेव प्राप्त हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौलिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है तथा उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं।
 ७. सप्तम दुर्गा : श्री कालरात्रि- 
                                              मा कालरात्री  इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह काला है। सिर के बाल बिखरे है। गले मे विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। तीन नेत्र है। इनके वाहन गर्दभ है। इनका स्वरूप देखने मे अत्यंत भयंकर है।
८ .अष्टम दुर्गा : श्री महागौरी- 
                                        मा महागौरी  मा की आठवी शक्ती का नाम महागौरी है। यह गौर वर्ण की है। अपने पार्वती रूप मे इन्होने भगवान शिव को पती रूप मे प्राप्त करने का कठोर तपस्या की थी
९.नवम् दुर्गा : श्री सिद्धिदात्री- 
                                          नवरात्रि के नवम् दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त निर्वाण चक्र (मध्य कपाल) में स्थिर कर अपनी साधना करनी चाहिए। श्री सिद्धिदात्री की साधना करने वाले साधक को सभी  देवी कुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से सिद्धियो को प्राप्त किया था। इन्ही की अनुकंपा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इनका वाहन सिंह है। यह कमल पुष्प पर आसीन होती है।



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