लोग कहते महिलाओं के सम्मान और गौरव को समर्पित यह दिवस जब भी आता है मुझे लगता है हम एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे चल रहे हैं। दिन की महत्ता से इंकार नहीं मगर उलझन तब होती है जब उपलब्धियों की रोशन चकाचौंध में कहीं कोई स्याह सच कराहता नजर आता है और एक कड़वाहट गले तक आ जाती है। फिर अचानक घनघोर अंधेरे के बीच भी दूर कहीं आशा की टिमटिमाती रोशनी दिखाई पड़ जाती है और मन फिर उजले कल के अच्छे सपने देखने लगता है।लेकिन क्या होगा इस दुनिया जहा महिला आज भी सुरछित नहीं है ? क्यों एक ओरत ७० और ८० के बीच आयु लुटेरो ने हत्या कर दी यह दिल्ली की रहने वाली थी लेकिन उस पर दिल्ली की मुखमत्री शीला दीक्षित कहती है दिल्ली मै महिलाये खुद को सुरछित महसूस नहीं करती है . लेकिन यह सोचना ठीक नहीं है .की पुलिस आईगी और सुरक्षा देगी किसी महिला की सुरक्षा परिवार और समाज से शुरू होती है ?
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