निर्मल बाबा यानि निर्मल जीत सिंह पहले झारखंड में सड़कों की ठेकेदारी करता था, यहां ये न काम हुए और ये धर्म की ठेकेदारी करने लगा। मैं आपको बताता हूं कि ये बाबा पकड़ा कैसे गया। दरअसल इसमें कुछ तो इसके कार्यकर्ताओं की बेवकूफी थी और कुछ बाबा का बड़बोलापन। अब आप खुद सोचें की टीवी चैनल पर बाबा का जो समागम दिखाया जाता है, उसके आखिर में दस पंद्रह तारीखें उन समागमों की बताई जाती है, जिसकी बुकिंग बंद कर दी गई है। लेकिन जो समागम होने को है, उसका कहीं जिक्र नहीं किया जाता। अब ऐसे विज्ञापन दिखाओगे तो पकड़े ही जाओगे ना।
इस बात से ही लोगों का शक गहराया कि बाबा के समागम में कुछ झोल जरूर है। फिर बाबा जब तक लोगों को उनके घर के मंदिर में कौन कौन से देवी देवता होने चाहिए, उनका स्थान कैसा होना चाहिए, किस भगवान के चित्र कहां मौजूद होने चाहिए, पूजा की विधि क्या होनी चाहिए, कब कहां जगह दर्शन करने जाना चाहिए, समस्या सुन कर बाबा जब तक भक्तों को ये बताते रहे कि माता वैष्णों देवी के दर्शन करो या फिर साईं राम के दर्शन करने जाओ। ऐसे कुछ और पीठ हैं, जहां दर्शन करने को बाबा कहते थे। ये बात तो समझ में आती है और मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि अगर हम सच्चे मन से माता वैष्णो देवी या फिर साई राम के धाम में मत्था टेकते है, तो मुश्किल कम होती ही हैं। पर नोटों की गड्डियों पर बैठकर निर्मल ने तो धर्म की ऐसी तैसी करनी शुरू कर दी। ये खुद भगवान बन गया और लोगों से उल्टी सीधी बातें करके उनका इलाज बताने लगा। ऐसे मे भगवान को इसका भी इलाज करना जरूरी हो गया। उससे ये बाबा पूछता है कि तुम्हारे सामने मुझे आलू की टिक्की क्यों दिखाई दे रही है। भक्त कहता है कि बाबा हमने तो कई साल हो गए आलू की टिक्की खाई ही नहीं। तो बाबा फिर पूछता है, तुमने आखिरी बार आलू की टिक्की देखी कब ? अरे बेवकूफी की हद है ना..। किसी भी रास्ते से गुजर जाओ, तमाम चाट ठेले वाले दिखाई पड़ जाएंगे । जाहिर है नजर पडेगी ही। भक्त कहता है कि समागम में आ रहा था तो रास्ते में एक ठेले पर देखा था। बाबा कहता है तो तुम्हारी खाने की इच्छा नहीं हुई। भक्त भला क्या जवाब दे, कहता है हां हुई तो..। फिर खाया क्यों नहीं.। जाओ समागम से निकलते ही खुद भी आलू की टिक्की खा लेना और कुछ टिक्की गरीबों को खिला देना कृपा आनी शुरू हो जाएगी। कि ऐसे धोखेबाज बाबाओं से खुद भी बचें और लोगों को भी बचाइये। अभी तक आपको सिर्फ ये पता चला है कि इस बाबा ने दिल्ली में करोडों का होटल खरीदा है। इंतजार कीजिए होटल के भीतर की करतूतें भी जल्दी ही सामने आएंगी। वैसे इसे बाबा कहना भी गलत है, इसे पूजा पाठ का कोई ज्ञान नहीं है। सच कहूं तो इसका धर्म कर्म से दूर दूर तक कोई वास्ता ही नहीं है। चूंकि आज देश की मीडिया खासतौर पर टीवी चैनल के गाइड लाइन तय नहीं है, ये विज्ञापन के पैसे के लिए कुछ भी कार्यक्रम चला सकते हैं। देश की जनता को जो चूना इस बाबा ने लगाया है उसमें बाबा के साथ मीडिया को भी बराबर का जिम्मेदार ठहराया जाए तो गलत नहीं होगा। वैसे हां आपको हैरानी होगी, टीवी चैनल्स आधे घंटे का कोई प्रोग्राम तैयार करते हैं, उसमें लाखों रूपये खर्च होते हैं, फिर भी उसकी टीआरपी बाबा के विज्ञापन की आधी भी नहीं होती है। ऐसे में इसे टीआरपी बाबा कहना भी गलत नहीं होगा।
निर्मल बाबा जी का सच
१. फिलहाल बाबा के भारत के १६ राष्ट्रीय चैनलों, और ३ विदेशी चैनलों पर विदेशों में कार्यक्रम चल रहे है. केवल आस्था पर बीस मिनट का मासिक व्यय सवा चार लाख+टेक्स है, तो अन्य राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर कितना लगता होगा ?२. अगर बाबा के आशीर्वाद से सब कुछ हो सकता है तो इतने चैनल्स पर आने की क्या ज़रूरत?
3. अपने आरंभिक दिनों में नॉएडा के फिल्मसिटी में स्थित एक स्टूडियो में शूटिंग करते वक़्त बाबा के सामने जो लोग अपनी समस्या के हल होने का दावा करते थे, वे असली लोग न होकर "जुनियर आर्टिस्ट" हुआ करते थे ?
४ . आज भी ये "आर्टिस्ट" बदस्तूर जारी है..??
५ . बाबा के समाधान का एक उदहारण देखिये : आपके घर में गणेश जी की मूर्ती है ? अकेली है? नहीं..तो अकेली लगाओ.. हाँ तो लक्ष्मी जी के साथ लगाओ, इस से समृद्धि आएगी... दक्षिण में है तो उत्तर में लगाओ, उत्तर में है तो दक्षिण में लगाओ... खड़े है तो बैठे हुए गणेशजी लगाओ... बैठे है तो खड़े गणेश जी लाओ... क्या आपने इस स्थिति को महसूस नहीं किया ?
माने आपकी हर बात का कोई न कोई जवाब... और फिर हर जगह लक्ज़री की बात !!!
६ . बाबा के किसी शहर में जाने से पूर्व वह एक टीम पहले जाकर "मार्केटिंग" का काम संभालती है. और मार्केटिंग भी ऐसी वैसी नहीं... भरी वाली ? क्यों,जबकि बाबा तो अंतर्यामी है..आपके घर की हर चीज़ आँखे बंद करके देख सकते है ??
७ . युवराज के घरवालों के आरोप तो आपको पता होंगे ?
ऐसे मे अब निर्मल बाबा का क्या होगा .......कानून या जनता इन्हें माफ़ करेगी .....या फिर ऐसे बाबाओ का क्या करना चहिये

No comments:
Post a Comment